देवभूमि उत्तराखंड में रमा एकादशी या धनतेरस को मुख्य रूप से च्यूडे बनाने के लिए धान भिगोने की परंपरा है। वैसे च्यूडे 3:रात्रि या 5:रात्रि पूर्व भिगोए जाते हैं। परंतु यहां शुभ दिन का होना भी नितांत आवश्यक है।
इस बार दिनांक 10 नवम्बर 2023 दिन शुक्रवार को च्यूड़े बनाने के लिए धान भिगोये जायेंगे।

*च्यूडे बनाने की पारंपरिक विधि,,,,*
धान को 3 रात्रि या पांच रात्रि भिगोने के उपरांत गोवर्धन पूजा के दिन इन्हें तेल की कढ़ाई में कुछ समय तक आग में भूना जाता है इसके बाद तुरंत गर्म अवस्था में ओखली में मुसल द्वारा कूटा जाता है। यह धान से चावल को अलग करने की पारंपरिक विधि है। आग में भुने हुए होने के कारण यह स्वादिष्ट होता है इसे ही च्यूडे कहा जाता है। च्यूडे को ओखली में मुसल से कूटने से पूर्व धूप जलाकर सर्वप्रथम ओखल की पूजा की जाती है। ओखल की पूजा का मुख्य उद्देश्य यह है कि इस ओखल में कूटा अनाज संपूर्ण परिवार को वर्ष भर खाने को पर्याप्त मिले और परिवार के किसी भी सदस्य को भूखे पेट न सोना पड़े। भाई दूज (दुतिया त्यार) के दिन प्रातः स्नान एवं पूजा पाठ के उपरांत घर की सयानी महिलाएं सर्वप्रथम च्यूडे कुल इष्ट मंदिरों घर के मंदिर में चढ़ाते हैं। तदुपरांत परिवार के प्रत्येक सदस्य के सिर में चढ़ाते हैं। सिर में चढ़ाने से पूर्व सरसों के तेल को दूर्वा अर्थात दूब के तिनकों से सिर में लगाया जाता है। परिवार के सभी जन एक दूसरे को च्यूडे पूजते हैं। मुख्यतः बहन भाई को च्यूडे पूजती है। इस दिन यमराज भी अपनी बहन यमुना के यहां च्यूडे पूजने जाते हैं।
*जी रया जागि रया ।*
*यो दिन मास भेटनै रया।*
*सिहक जस तराण*
*स्यावक जस बुद्धि हो।*
*धरती जतुक चकाव*
*अकास जतुक उकाव हैया*
आदि आशीर्वचन के साथ च्यूडे पूजे जाते हैं। परंतु समय के साथ-साथ नई पीढ़ी को न आशिर्वचनों का महत्व पता है और ना ही च्यूडे के संबंध में जानकारी। अब वर्तमान में यह परंपरा समाप्त होने की कगार पर है। हमें यह परंपरा समाप्त होने से बचाने का यथासंभव प्रयत्न करना चाहिए। हालांकि कुछ गांव एवं घरों में यह परंपरा जीवित है। शहरों में रहने वाले लोग बाजार से मशीनों द्वारा निर्मित पोहा या खिल के द्वारा च्यूड़ा पूजने के लिए लाते हैं परंतु उन पोहा में न स्वाद है और न ही अपनापन।
आमा ईजा काखी ज्याडजा के हाथों की महक पोहों में नहीं होती। प्रगति एवं विकास ने हमसे हमारी लोक-संस्कृति तो छीन ही ली है साथ ही अपनापन भी छीन लिया।
च्यूडे पूजने के अतिरिक्त खाये भी जाते हैं। च्यूडे के साथ अखरोट सोयाबीन आदि मिलाकर खाया जाता है।
*लेखक आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल।*

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