हिंदुओं की धार्मिक मान्यता के अनुसार एकादशी व्रत का अत्यधिक महत्व है। जेष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अचला
एकादशी या अपरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से अपार धन संपदा
का लाभ प्राप्त होता है।
*शुभ मुहूर्त*
इस बार अपरा एकादशी व्रत या अचला एकादशी व्रत 2 दिन मनाया जाएगा। जहां एक ओर शैव संप्रदाय के भक्त जन दिनांक 2 जून 2024 तो वहीं वैष्णव सम्प्रदाय के भक्त जन 3 जून को मनायेंगे। यदि एकादशी तिथि की बात करें तो एकादशी तिथि दिनांक 2 जून दिन रविवार से प्रारंभ होगी और 53 घड़ी 35 पाल अर्थात अगले दिन प्रात 2:41 बजे तक रहेगी। यदि नक्षत्र की बात करें तो इस दिन रेवती नमक नक्षत्र 51 घड़ी दो पल अर्थात मध्य रात्रि 1:41 बजे तक है। इस दिन आयुष्मान नामक योग 17 घड़ी 19 पाल अर्थात दोपहर 12:11 बजे तक है। बव नामक करण 26 घड़ी 35 पल अर्थात शाम 3:54 बजे तक है। सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन के चंद्रमा की स्थिति को जाने तो इस दिन चंद्र देव मध्य रात्रि 1:41 तक मीन राशि में विराजमान रहेंगे तदुप्रांत चंद्र देव मेष राशि में प्रवेश करेंगे।
*पूजा विधि-*
अपरा एकादशी व्रत के दिन प्रातःब्रह्म मुहुर्त में उठकर स्नानादि से
निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें।भगवान विष्णु की प्रतिमा और
माता लक्ष्मी जी की प्रतिमा को पीले आसन पर विराजमान करें।
तदोपरांत रोली कुमकुम का तिलक लगाएं धूप दीप नैवेद्य चढ़ाकर
भगवान विष्णु की पूजा करें।जलाभिषेक करने के लिए शंख का प्रयोग करें। पाठकों को बताना
चाहुंगा कि शंख माता लक्ष्मी को अत्यधिक प्रिय है। इसलिए शंख से
जलाभिषेक या दुग्ध अभिषेक करने से माता लक्ष्मी की विशेष
कृपा होती है। व्रत पारण के समय ब्राह्मणों को भोजन कराएं और
यथासंभव दान दें । इससे आर्थिक उन्नति और मानसिक लाभ प्राप्त
होता है। पाठकों को एक और महत्वपूर्ण बात बताना चाहूंगा कि
एकादशी व्रत के दिन नाखून बाल आदि ना काटें और स्नान में साबुन
का प्रयोग भी ना करें। इस दिन परिवार में कोई भी सदस्य चावल
ग्रहण न करें।
*अपरा एकादशी व्रत कथा-*
अचला एकादशी की प्रचलित कथा
के अनुसार प्राचीन समय में माहीध्वज नामक -एक धर्मत्मा राजा था।
उसका छोटा भाई वज्र ध्वज बड़ा ही क्रूर अधर्मी तथा अन्यायी था।
उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी
देह को एक जंगल में पीपल के पेड के नीचे गाढ़ दिया। इस अकाल
मृत्यु से राजा प्रेत आत्मा के रूप में उसी पीपल वृक्ष पर रहने लगा और
अनेक उत्पात करने लगा। एक दिन अचानक धौम्य नामक ऋषि उधर
से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके अतीत को
जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत
उत्पाद का कारण भी समझा। ऋषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल
के पेड़ से नीचे उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया। दयालु
ऋषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा एकादशी का व्रत किया और उसे प्रेत योनि से छुड़ाने के लिए व्रत का पुण्य प्रेत को
अर्पित कर दिया। इस पुण्य के
प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ऋषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण
कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया। अत: अपरा
एकादशी की कथा पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पार्पों से छूट
जाता है।

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लेखक –: आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया, नैनीताल।

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