एकलपीठ के आदेश के कुछ आदेश रद्द किए ।
नैनीताल । मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने रम्पुरा रुद्रपुर में ‘वक्फ अल्लाह ताला, दरगाह हजरत मासूम साह मियां’ बनाम ‘एनएचएआई’ मामले में एकल पीठ के आदेश के विरुद्ध दायर विशेष अपील को निस्तारित करते हुए आदेश दिया है कि याचिका का दायरा केवल विवादित मजार के मलबे के निस्तारण और उसे वैकल्पिक स्थान पर स्थानांतरित करने तक ही सीमित रहेगा।
यह मामला रुद्रपुर के ग्राम रामपुरा में स्थित एक मजार से जुड़ा है, जो राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत अधिग्रहित भूमि पर स्थित थी। अपीलकर्ता ने मूल रूप से मजार को न हटाने और उसे नुकसान न पहुँचाने के लिए परमादेश की मांग की थी। एकल पीठ ने 25 अप्रैल 2025 के अपने अंतरिम आदेश में इस याचिका का दायरा बढ़ाते हुए मुख्य सचिव को हर जिले में सरकारी भूमि पर बने ऐसे निर्माणों की पहचान के लिए कमेटियां बनाने का निर्देश दे दिया था।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि जब रिट याचिका का विवाद केवल एक विशिष्ट संपत्ति तक सीमित था, तो उसके दायरे को बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं था। अदालत ने एकल पीठ द्वारा याचिका का दायरा बढ़ाने वाले आदेश के उस हिस्से को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। खंडपीठ के अनुसार, इस तरह के जटिल कानूनी और नीतिगत विषयों को इस याचिका का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए था।
अपीलकर्ता की ओर से उनके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एकल पीठ ने राजस्व अभिलेखों की जांच किए बिना ही विवादित भूमि को सरकारी या ‘नजूल’ भूमि मान लिया था। उन्होंने खतौनी और खसरा प्रविष्टियों का हवाला देते हुए कहा कि यह निष्कर्ष गलत था कि भूमि के स्वामित्व पर कोई विवाद नहीं है। राज्य सरकार ने इसके विपरीत तर्क दिया कि उक्त भूमि सरकारी ‘बंजर’ श्रेणी की है।
अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि चूंकि भूमि का अधिग्रहण राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत हो चुका है, इसलिए मजार के ढांचे को गिराने से रोकने की राहत अब विचारणीय नहीं रह गई थी। अपीलकर्ता ने स्वयं ही मजार के अवशेषों और मिट्टी को अपने निजी आवास पर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया था। वर्तमान में, मजार का मलबा और मिट्टी प्रशासन के कब्जे में है और इसका एक मेमो भी तैयार किया गया है ।
स्वामित्व के विवाद पर खंडपीठ ने व्यवस्था दी कि स्वामित्व जैसे पेचीदा सवालों की जांच रिट क्षेत्राधिकार के तहत नहीं की जा सकती। अदालत ने अपीलकर्ता को छूट दी कि यदि वे स्वयं को अधिग्रहित भूमि का स्वामी मानते हैं, तो वे राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम की धारा 3 एच के तहत या किसी अन्य उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अपना दावा पेश कर सकते हैं।
खंडपीठ ने यह भी आदेश दिया कि एकल पीठ द्वारा अपने अंतरिम आदेश में की गई कोई भी प्रतिकूल टिप्पणी अपीलकर्ता के भविष्य के कानूनी दावों या कार्यवाही के आड़े नहीं आएगी। अदालत ने माना कि अपीलकर्ता के पास राजस्व अभिलेखों के आधार पर अपनी बात रखने का पूरा अधिकार सुरक्षित है।
खण्डपीठ ने 10 मार्च 2026 को इस विशेष अपील को निस्तारित करते हुए रिट याचिका को केवल मजार के मलबे के सम्मानजनक निस्तारण और वैकल्पिक स्थल पर स्थानांतरण की प्रक्रिया तक सीमित कर दिया है। इससे पूर्व में दिया गया व्यापक सर्वेक्षण का आदेश प्रभावी नहीं रहेगा।


