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​नैनीताल।
उत्तराखंड के नैनीताल स्थित द्वितीय अपर सेशन जज व प्रभारी विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) कुलदीप शर्मा की अदालत ने एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर दुष्कर्म के लिए मजबूर करने की आरोपी युवती की जमानत याचिका मंजूर कर ली है। न्यायालय ने आरोपी महिला को ₹50,000 के व्यक्तिगत बंधपत्र और इतनी ही राशि के दो सक्षम प्रतिभूतियों (जमानती) को प्रस्तुत करने पर रिहा करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया है कि जमानत के दौरान आरोपी महिला पीड़िता से किसी भी माध्यम से संपर्क नहीं करेगी, न ही उसे डराने या धमकाने का प्रयास करेगी और विचारण (ट्रायल) के दौरान हर तारीख पर कोर्ट में उपस्थित रहेगी।

 

​क्या था पूरा मामला?
​अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी लड़की पर मुख्य रूप से यह आरोप है कि उसने 4 अक्टूबर 2025 को पीड़िता को काठगोदाम स्थित ‘रॉयल विल्सन होटल’ में ले जाकर मोबाइल फोन और पैसों का लालच दिया। इसके बाद आरोपी महिला ने पीड़िता को सह-आरोपी नरेश पांडे के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाया। जब पीड़िता ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो आरोपी नरेश पांडे ने पीड़िता के साथ जबरन बलात्कार किया। घटना के समय पीड़िता की आयु 18 वर्ष से कम (नाबालिग) थी, जिसके बाद मल्लीताल थाने में पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया और 14 जुलाई 2026 को आरोपी महिला को गिरफ्तार किया गया था।

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​बचाव पक्ष और कोर्ट की अहम टिप्पणियां

​सुनवाई के दौरान आरोपी लड़की के वकील ने दलील दी कि वह निर्दोष है और उसे रंजिशन झूठा फंसाया गया है, क्योंकि उसने पहले ही अन्य आरोपियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई हुई थी। वहीं, कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि 4 अक्टूबर 2025 को हुई इस कथित घटना की एफआईआर करीब 9 महीने की लंबी देरी के बाद 12 जुलाई 2026 को दर्ज करवाई गई। इसके अलावा, कथित घटना का वीडियो पीड़िता के मोबाइल से बनने की बात कही गई थी, लेकिन पुलिस विवेचक कोर्ट के समक्ष ऐसा कोई भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश करने में नाकाम रहे। विवेचक ने मौखिक रूप से स्वीकार किया कि होटल का वीडियो भी अभी तक संकलित नहीं किया जा सका है।

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​जमानत नियम है और जेल अपवाद: कोर्ट

​विशेष पॉक्सो अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ‘गुरबक्श सिंह सिबिया बनाम पंजाब राज्य’ और ‘गुडीकांति नरसिम्हुलु’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “जमानत एक नियम है और जेल भेजना अपवाद है।” कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि विवेचक ने आरोपी लड़की के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य जुटाए बिना, अत्यंत देरी से दर्ज कराई गई एफआईआर के आधार पर आरोपी को बहुत जल्दबाजी और हड़बड़ी में गिरफ्तार किया है। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (जैसे वीडियो) की अनुपलब्धता और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने आरोपी महिला को इस स्तर पर जमानत देना न्यायसंगत माना और उसकी याचिका को शर्तों के साथ स्वीकार कर लिया।

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