नैनीताल। जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रशान्त जोशी की अदालत ने भवाली व्यापार मंडल के अध्यक्ष नरेश पाण्डे की अग्रिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। आरोपी के खिलाफ थाना मल्लीताल में एक युवती द्वारा शादी का झांसा देकर साढ़े तीन साल से अधिक समय तक शारीरिक शोषण करने, गर्भवती होने पर गर्भपात कराने और धमकाने के गंभीर आरोपों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 351(2) और 69 के तहत मुकदमा दर्ज है। न्यायालय ने मामले की तात्कालिक गंभीरता और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को देखते हुए आरोपी को कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया।
मामले के अनुसार, पीड़िता ने तहरीर में बताया था कि जब वह 17 वर्ष की थी, तब आरोपी ने खुद को अविवाहित बताकर उसके साथ संबंध बनाए और शादी का वादा किया। बाद में गर्भवती होने पर आरोपी ने उसका गर्भपात भी कराया। वहीं दूसरी ओर, आरोपी नरेश पाण्डे के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि उनका मुवक्किल विवाहित है और उसे राजनीतिक द्वेष व बढ़ती लोकप्रियता के कारण झूठा फंसाया जा रहा है। आरोपी पक्ष ने यह भी दावा किया कि एफआईआर काफी देरी से एक सोची-समझी साजिश के तहत दर्ज कराई गई है।
अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन और जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) सुशील कुमार शर्मा ने जमानत का पुरजोर विरोध किया। अभियोजन ने अदालत को बताया कि आरोपी नरेश पाण्डे का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है और उसके खिलाफ पूर्व में थाना भवाली में आठ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिसमें गुंडा एक्ट की कार्रवाई भी शामिल है। इसके अलावा, यह बात भी सामने आई कि आरोपी ने इससे पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय (नैनीताल) से भी गिरफ्तारी पर रोक और अंतरिम संरक्षण की गुहार लगाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने उसके आपराधिक इतिहास को देखते हुए पहले ही खारिज कर दिया था।
न्यायालय ने अपने आदेश में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि मुकदमा दर्ज होने के बाद पीड़िता लगातार अपने बयानों से मुकर रही है और कार्रवाई न करने के प्रार्थना पत्र दे रही है। अदालत ने कहा कि पीड़िता एक महिला है और आरोपी द्वारा उसे डराने-धमकाने या प्रभावित करने की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। सत्र न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि पीड़िता का इस तरह मुकरना मामले को संदिग्ध बनाता है, जिसकी सघन और निष्पक्ष विवेचना जरूरी है। ऐसे में यदि आरोपी को अग्रिम जमानत दी गई, तो वह गवाहों को डराकर निष्पक्ष जांच को प्रभावित कर सकता है, इसलिए उसकी याचिका को खारिज किया जाता है।


