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नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं (सीनियर एडवोकेट) के पदनाम के लिए योग्य वकीलों से आवेदन आमंत्रित किए हैं।
रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी आधिकारिक नोटिस के अनुसार, यह प्रक्रिया ‘द हाई कोर्ट ऑफ उत्तराखंड (डेजिग्नेशन ऑफ सीनियर एडवोकेट्स) रूल्स, 2026’ के नियम 6 के तहत शुरू की गई है। इच्छुक और पात्र वकील आगामी 17 अगस्त 2026 को शाम 5:00 बजे तक अपने आवेदन कोर्ट के प्रशासनिक अनुभाग (एडमिन. ए) में समीक्षा अधिकारी पीयूष पंत के कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से या रजिस्टर्ड पोस्ट के जरिए जमा करा सकते हैं।
इसके अलावा, आवेदकों को सुविधा देते हुए ईमेल ([email protected]) के माध्यम से भी तय तिथि तक आवेदन भेजने की छूट दी गई है। वकीलों को अपने आवेदन के साथ पिछले पांच वर्षों के रिपोर्टेड या अनरिपोर्टेड फैसलों (जजमेंट्स) की सॉफ्ट कॉपी ईमेल या पेन ड्राइव के जरिए जमा करनी होगी।
​इन पदों के लिए हाई कोर्ट ने पात्रता के कड़े मानदंड तय किए हैं। नया नियम ‘द हाई कोर्ट ऑफ उत्तराखंड (डेजिग्नेशन ऑफ सीनियर एडवोकेट्स) रूल्स, 2026’ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘जितेन्द्र उर्फ कल्ला बनाम राज्य’ मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के आधार पर तैयार किया गया है। नियमों के मुताबिक, केवल वही वकील इसके लिए पात्र होंगे जो उत्तराखंड राज्य बार काउंसिल में नामांकित हैं और जिनके पास उत्तराखंड के किसी जिला न्यायालय, ट्रिब्यूनल या हाई कोर्ट में वकालत का कम से कम 10 वर्षों का अनुभव है।
आवेदन के लिए न्यूनतम आयु 45 वर्ष निर्धारित की गई है, हालांकि विशेष परिस्थितियों में फुल कोर्ट (पूर्ण अदालत) कारणों को दर्ज कर इसमें ढील दे सकती है। इसके अलावा उम्मीदवार का कानून में विशेष ज्ञान, प्रो-बोनो (मुफ्त कानूनी सहायता) कार्यों में भागीदारी और साफ-सुथरा पेशेवर रिकॉर्ड होना अनिवार्य है।
​सीनियर एडवोकेट के चयन की पूरी प्रक्रिया मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) की अध्यक्षता वाली एक ‘स्थायी समिति’ और ‘फुल कोर्ट’ के माध्यम से लोकतांत्रिक तरीके से संपन्न होगी। सचिवालय में आवेदन प्राप्त होने के बाद अन्य हितधारकों से सुझाव और विचार मांगे जाएंगे और अंतिम निर्णय फुल कोर्ट द्वारा सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिया जाएगा।
खास बात यह है कि यदि कोई योग्य वकील खुद आवेदन नहीं भी करता है, तो भी फुल कोर्ट उसकी सहमति से उसे यह सम्मान दे सकती है। इसके साथ ही, अन्य राज्यों के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों या पूर्व न्यायाधीशों को भी इस पदनाम के लिए विचार का मौका दिया जाएगा। नए नियम लागू होने के साथ ही साल 2018 के पुराने नियमों को निरस्त कर दिया गया है।

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