इलाहाबाद हाई कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने अपने पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया है। 9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजे गए अपने त्याग पत्र में न्यायमूर्ति वर्मा ने लिखा कि वे अपने इस निर्णय के पीछे के कारणों से राष्ट्रपति कार्यालय को बोझिल नहीं करना चाहते, लेकिन उन्होंने अपने इस्तीफे को ‘गहरी पीड़ा’ के साथ लिया गया फैसला बताया है।

उन्होंने पत्र में उल्लेख किया कि इस कार्यालय में सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात रही। इस पत्र की प्रति भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत को भी भेजी गई है।
न्यायमूर्ति वर्मा का यह अचानक इस्तीफा कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि आधिकारिक पत्र में इस्तीफे का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है, लेकिन सोशल मीडिया और विभिन्न हलकों में इसे उनके आवास पर हुई पिछली कुछ जांचों और नकदी बरामदगी की खबरों से जोड़कर देखा जा रहा है। तत्काल प्रभाव से पद छोड़ने के उनके इस निर्णय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि वे एक महत्वपूर्ण न्यायिक पद पर आसीन थे।
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ पिछले साल अगस्त में बहुदलीय नोटिस लोकसभा में लाया गया था। इस नोटिस में यशवंत वर्मा को न्यायाधीश के पद से हटाने की बात कही गई थी। मामले की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय समिति बनाई थी, जिसमें भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी.आचार्य शामिल थे।
इसी साल फरवरी में लोक सभाध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव की जगह बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर को तीन सदस्यीय समिति में शामिल किया। समिति की जांच चल रही है और जल्द ही जस्टिस वर्मा को उनके पद से हटाया जा सकता था।
जस्टिस वर्मा ने एक सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कहा था कि उनको पद से हटाने के लिए जो संसदीय पैनल बनाया गया है, वह वैध नहीं है। इस पर फैसला सुनाते हुए जनवरी में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि किसी भी कानून का इस्तेमाल संसद की कार्रवाई को बाधित करने के लिए नहीं किया जा सकता है।


