नई दिल्ली/ नैनीताल । हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा रेलवे भूमि विवाद में आज सुप्रीम कोर्ट ने अपना अंतिम रुख स्पष्ट कर दिया है। शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यह विवादित जमीन भारतीय रेलवे की है और विकास परियोजनाओं के विस्तार के लिए इस क्षेत्र से अतिक्रमण हटाया जाना अनिवार्य है।
अदालत ने साफ किया कि सार्वजनिक भूमि पर कब्जा करने वाले लोग रेलवे को अपनी शर्तें नहीं बता सकते, हालांकि मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास की ठोस व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि रेलवे के पास अपनी लाइनों और बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि हजारों लोगों को रातों-रात बेघर नहीं किया जा सकता, लेकिन साथ ही अवैध कब्जे को लंबे समय तक जारी रखने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती। अदालत ने रेलवे और उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया है कि वे उन परिवारों की पहचान करें जो इस फैसले से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं।
प्रभावित परिवारों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कोर्ट ने प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) का सहारा लेने का सुझाव दिया है। फैसले के अनुसार, जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) की श्रेणी में आते हैं, वे इस योजना के तहत पक्के मकानों के लिए आवेदन कर सकते हैं। कोर्ट ने जिला प्रशासन को आदेश दिया है कि वह प्रभावितों की पात्रता की जांच करे और यह सुनिश्चित करे कि जो लोग हकदार हैं, उन्हें नियमानुसार आवास आवंटित किए जाएं।
अदालत ने मानवीय आधार पर एक और महत्वपूर्ण राहत देते हुए निर्देश दिया है कि आगामी त्यौहारों (रमजान और ईद) को देखते हुए फिलहाल कोई तोड़फोड़ नहीं की जाएगी। कोर्ट ने 19 मार्च 2026 के बाद इलाके में विशेष पुनर्वास कैंप लगाने के निर्देश दिए हैं। इन कैंपों के माध्यम से परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में मदद की जाएगी, ताकि जब वे वहां से हटें, तो उनके पास रहने के लिए वैकल्पिक छत मौजूद हो।
वित्तीय सहायता के मोर्चे पर भी सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है। अदालत ने कहा है कि पुनर्वास प्रक्रिया के दौरान पात्र परिवारों को विस्थापन के बाद शुरुआती छह महीनों तक प्रति माह 2,000 रुपये का गुजारा भत्ता दिया जाए। यह राशि रेलवे और राज्य सरकार द्वारा संयुक्त रूप से वहन की जाएगी। इस कदम का उद्देश्य विस्थापित होने वाले गरीब परिवारों को आर्थिक रूप से संभलने का मौका देना है।
प्रशासनिक स्तर पर, नैनीताल के जिलाधिकारी और राजस्व अधिकारियों को इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्यों को घर-घर जाकर लोगों को उनके अधिकारों और पुनर्वास की योजनाओं के बारे में जानकारी देनी चाहिए। इस दौरान प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी सावधानी बरतने के भी निर्देश दिए गए हैं।
गौरतलब है कि यह कानूनी लड़ाई लंबे समय से चल रही थी, जिसमें रेलवे ने 29 एकड़ जमीन पर 4,365 घरों के अतिक्रमण का दावा किया था। आज के फैसले के बाद अब हल्द्वानी में रेलवे विस्तार का रास्ता साफ हो गया है, जबकि प्रभावित परिवारों को पुनर्वास की एक नई उम्मीद मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में तय की है, जिसमें पुनर्वास कैंपों की प्रगति रिपोर्ट पेश की जाएगी।


