नैनीताल । उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने चरस तस्करी के एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए आरोपी श्रवण कुमार की जमानत अर्जी स्वीकार कर ली है।
न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी को निजी मुचलके और दो विश्वसनीय प्रतिभुओं पर रिहा करने का आदेश दिया। यह मामला थाना देवप्रयाग, जिला टिहरी गढ़वाल में एन.डी.पी.एस. एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया था
आरोपी के अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि पुलिस ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से 2 किलो 9 ग्राम चरस की फर्जी बरामदगी दिखाकर उसे फंसाया है। बचाव पक्ष का मुख्य तर्क यह था कि जब्ती की कार्रवाई के दौरान तैयार किए गए दस्तावेजों में एफआईआर दर्ज होने से पहले ही एफआईआर नंबर अंकित था। अधिवक्ता ने इसे पुलिस की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा करने वाली और कानून का उल्लंघन करने वाली प्रक्रिया बताया।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कथित बरामदगी के समय कोई भी स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था और आरोपी 27 दिसंबर 2025 से जेल में बंद है। बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि एन.डी.पी.एस. अधिनियम की धारा 50 और 50(6) के अनिवार्य प्रावधानों का भी इस मामले में पालन नहीं किया गया है। इन दलीलों ने अभियोजन पक्ष के दावों को कमजोर कर दिया ।
राज्य सरकार के अधिवक्ता (ए.जी.ए.) ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि बरामद नशीला पदार्थ ‘कमर्शियल मात्रा’ में है। उन्होंने कहा कि पुलिस के पास आरोपी को झूठे मामले में फंसाने का कोई कारण नहीं है और अपराध की गंभीरता को देखते हुए जमानत नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद विसंगतियों को अधिक महत्वपूर्ण माना।
न्यायमूर्ति आशीष नैथानी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मौके पर तैयार दस्तावेजों में एफआईआर नंबर का पहले से मौजूद होना एक गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितता है। कोर्ट ने माना कि आरोपी ने अनिवार्य कानूनी प्रावधानों के अनुपालन पर ठोस सवाल उठाए हैं। जमानत देते हुए कोर्ट ने यह शर्त भी रखी कि आरोपी जांच और परीक्षण में पूरा सहयोग करेगा और जमानत की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेगा।


