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नैनीताल  । उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने यू.पी.एन.एल. (उपनल) के माध्यम से पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से कार्यरत फार्मासिस्टों के नियमितीकरण के मामले में कड़ा रुख अपनाया है।

 

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने राज्य सरकार को एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा है कि कुंदन सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में दिए गए नियमितीकरण के निर्देशों का पालन अब तक क्यों नहीं किया गया।

मामले के अनुसार, संविदा पर तैनात फार्मासिस्टों दीपक कुमार व  अन्य ने अपनी सेवाओं के नियमितीकरण और न्यूनतम वेतनमान की मांग को लेकर विशेष अपील दायर की थी । इन कर्मियों का कहना है कि जब उनकी नियमितीकरण की मांग लंबित थी, तब  चिकित्सा सेवा चयन बोर्ड ने नए पदों के लिए विज्ञापन जारी कर दिया, जिससे उनके भविष्य पर संकट आ गया है। इससे पहले एकल पीठ ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि नियमितीकरण के लिए कोई स्पष्ट योजना या नियमावली पेश नहीं की गई है।

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अपीलकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता वी.बी.एस. नेगी व अधिवक्ता ललित सामंत ने दलील दी कि कुंदन सिंह मामले में हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने 2018 में ही राज्य सरकार को उपनल कर्मियों को चरणबद्ध तरीके से नियमित करने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की एस.एल.पी. को सुप्रीम कोर्ट  भी अक्टूबर 2024 में खारिज कर चुका है। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश ने इस महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पर विचार नहीं किया।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सरकार ने अदालती आदेशों के अनुपालन के लिए सात सदस्यीय समिति तो बनाई, लेकिन उसकी सिफारिशें केवल न्यूनतम वेतनमान और महंगाई भत्ते तक ही सीमित रहीं। कोर्ट ने 3 फरवरी 2026 को जारी सरकारी आदेश  का अवलोकन करने के बाद पाया कि इसमें वेतन संबंधी प्रावधान तो हैं, लेकिन चरणबद्ध नियमितीकरण के बारे में कोई ठोस योजना नहीं है।

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उच्च न्यायालय ने अब इस मामले को ‘मंजुल मेहता बनाम उत्तराखंड राज्य’ से संबंधित अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ते हुए अगली सुनवाई 8 अप्रैल 2026 को तय की है। अदालत ने प्रथम प्रतिवादी (राज्य सरकार) को व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा है कि कुंदन सिंह मामले के ‘निर्देश ए’ (नियमितीकरण) को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

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